*भ्रष्टाचार पर पर्दा या कार्रवाई की आड़ में बलि का बकरा बनी खेल अधिकारी* ,,,,
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान एक बार फिर विवादों के केंद्र में है। मनेरा स्टेडियम छात्रावास में हुई मारपीट और विभिन्न शिकायतों के बाद शासन द्वारा जिला क्रीड़ा अधिकारी और उनके सहायक को निलंबित किया जाना प्रशासनिक कार्रवाई का सामान्य हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। सवाल केवल एक मारपीट की घटना या विभागीय शिकायतों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन आरोपों तक पहुंचते हैं जिनमें लंबे समय से संस्थान के भीतर वित्तीय अनियमितताओं, फर्जी भुगतान, विशेष कोर्सों के नाम पर चहेते लोगों को लाभ पहुंचाने और नियमों के विपरीत कार्य करने की बातें सामने आती रही हैं।

यदि वास्तव में तीन सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट में संस्थान के भीतर प्रक्रियागत उल्लंघन और आर्थिक गड़बड़ियों के संकेत मिले थे, तो स्वाभाविक रूप से अपेक्षा थी कि शासन उन मूल सवालों पर कठोर और पारदर्शी कार्रवाई करता। लेकिन वर्तमान घटनाक्रम में यह धारणा मजबूत हो रही है कि भ्रष्टाचार के बड़े मुद्दों से ध्यान हटाकर कार्रवाई का केंद्र कुछ अधिकारियों तक सीमित कर दिया गया है। इससे यह आशंका जन्म लेना स्वाभाविक है कि कहीं व्यवस्था अपनी विफलताओं और अंदरूनी गड़बड़ियों को छिपाने के लिए किसी एक अधिकारी को “बलि का बकरा” तो नहीं बना रही।
लोकतांत्रिक प्रशासन का मूल आधार निष्पक्षता और प्राकृतिक न्याय है। किसी भी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई से पहले उसका पक्ष सुनना, तथ्यों की स्वतंत्र जांच करना और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय लेना आवश्यक होता है। यदि किसी अधिकारी ने संदिग्ध भुगतानों या अनियमित वेतन वितरण पर आपत्ति जताई थी, तो उस पहलू की भी गंभीरता से जांच होनी चाहिए। भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने वालों को ही कठघरे में खड़ा कर देना किसी भी संस्थान की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव की चर्चाएं भी चिंता बढ़ाती हैं। यदि संस्थान की आंतरिक राजनीति और प्रभावशाली लोगों के दबाव में निर्णय लिए जा रहे हैं, तो यह केवल एक विभागीय विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता के लिए भी खतरे का संकेत है। ऐसे मामलों में सरकार की जिम्मेदारी केवल निलंबन तक सीमित नहीं हो सकती। आवश्यकता इस बात की है कि पूरे प्रकरण की उच्च स्तरीय, स्वतंत्र और समयबद्ध जांच हो, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तविक दोषी कौन हैं और क्या भ्रष्टाचार के मुद्दों को दबाने का प्रयास किया गया।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्रवाई केवल दिखावे तक सीमित न रहे। यदि संस्थान में वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं, तो उनकी जवाबदेही तय हो। और यदि किसी अधिकारी को व्यक्तिगत, राजनीतिक या संस्थागत कारणों से निशाना बनाया गया है, तो उसे न्याय भी मिले। क्योंकि जब भ्रष्टाचार पर सवाल उठाने वाले ही संदेह के घेरे में ला दिए जाते हैं, तब व्यवस्था की विश्वसनीयता स्वयं कटघरे में खड़ी हो जाती है।



